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Explainer: लेबनान के हिज़्बुल्लाह कौन हैं? जिसके लिए अमेरिका-ईरान डील पर मंडरा रहे खतरे के बादल

 Written By: Hussain Rizvi, Edited By: Malaika Imam
 Published : Jun 21, 2026 05:13 pm IST,  Updated : Jun 21, 2026 05:23 pm IST

हिज़्बुल्लाह लेबनान की आज़ादी के करीब 40 बरसों के बाद वजूद में आया। इज़रायल ने 1982 में लेबनान पर हमला किया और फलस्तीनी लड़ाकों के खिालाफ एक सैन्य अभियान चलाया। यहीं से हिज़्बुल्लाह की कहानी शुरू होती है।

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हिज़्बुल्लाह के लड़ाके Image Source : AP

Explainer: लेबनान मध्य पूर्व का एक छोटा सा मगर बेहद खूबसूरत देश है। भारत के किसी छोटे राज्य से भी छोटा होने के बावजूद इसकी भौगोलिक विविधता, इतिहास और सांस्कृति इस बहुत खास बनाते हैं। लेबनान के पश्चिम में मेडिटेरेनियन सी है, तो उत्तर और पूर्व में सीरिया और दक्षिण में इज़रायल की बस्तियां आबाद हैं। लेबनान कभी ऑटोमन एम्पायर का हिस्सा रहा। प्रथम विश्व युद्ध के बाद फ्रांस की कॉलोनी की तरह चलता रहा, लेकिन 1943 में लेबनान एक स्वतंत्र राष्ट्र के तैार पर दुनिया के नक्शे पर पहचाना गया। लेबनान को कभी मध्य पूर्व का स्विट्ज़लैंड कहा जाता था, जहां टूरिज़्म ख़ूब फल फूल रहा था, लेकिन गृहयुद्ध ने देश की आर्थिक स्थिति को खराब किया है।

हिज़्बुल्लाह कब और कैसे बना?

हिज़्बुल्लाह का शाब्दि अर्थ है अल्लाह की पार्टी और हिज़्बुल्लाह लेबनान की आज़ादी के करीब 40 बरसों के बाद वजूद में आया। 1979 में ईरानी क्रांति हुई। आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी सत्ता में आए। इसका असर पूरी मुस्लिम दुनिया पर पड़ा। उस वक्त लेबनान के एक हिस्से पर फलस्तीनी आबाद थे, जो हमेशा इज़रायल के टारगेट पर रहता था। इज़रायल ने 1982 में लेबनान पर हमला किया और फलस्तीनी लड़ाकों के खिालाफ एक सैन्य अभियान चलाया। यहीं से हिज़्बुल्लाह की कहानी शुरू होती है। ईरान की IRGC ने लेबनान के शिया गुटों को एक किया, उन्हें प्रशिक्षण दिया, हथियार मुहैया करवाए, वित्तीय सहायता दी और वैचारिक मार्गदर्शन किया। और देखते देखते हिज़्बुल्लाह एक बड़े राजनीतिक, सामाजिक और रणनीतिक संगठन के तौर पर खड़ा हो गया।

क्या हिज़्बुल्लाह ईरान का प्रॉक्सी है?

दुनियाभर के एक्सपर्ट्स इसे दो अलग-अलग तरीके से देखते हैं। एक तो ये कि हिज़्बुल्लाह ईरान का सबसे ताकतवर प्रॉक्सी है, जिसे ईरान धन बल सबकुछ मुहैया करवाता है, जिसके लिए अमेरिका ईरान डील भी खतरे में पड़ जाती है। इससे ईरान के लिए हिज़्बुल्लाह की अहमियत को समझा जा सकता है। एक दूसरा नज़रिया ये है कि हिज़्बुल्लाह ईरान का सहयोगी है, लेकिन पूरी तरह से उसके आदेश पर नहीं चलता है। हिज़्बुल्लाह के अपने लेबनानी राजनीतिक और सुरक्ष हित भी हैं।

क्या हिज़्बुल्लाह आतंकी संगठन है?

हिज़्बुल्लाह को अमेरिका, कनाडा, यूके, जर्मनी जैसे देशों ने आतंकी देशों की लिस्ट में डाल रखा है, तो अरब लीग जैसी संस्था भी इसी नज़र से देखती है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने हिज़्बुल्लाह को आतंकी संगठन की लिस्ट में नहीं रखा है, हालांकि हिज़्बुल्लाह को हथियारों से दूर रखने के लिए प्रस्ताव ज़रूर पास किए हैं। बाकी कुछ देश हिज़्बुल्लाह को एक आंदोलन और रेसिस्टेंस फोर्स के तौर पर देखते हैं।

हिज़्बुल्लाह के पूर्व नेता सैयद हसन नसरल्लाह की तस्वीर
Image Source : PTIहिज़्बुल्लाह के पूर्व नेता सैयद हसन नसरल्लाह की तस्वीर

हिज़्बुल्लाह एक राजनीतिक दल

हिज़्बुल्लाह सिर्फ एक मिलीशिया ही नहीं है, बल्कि लेबनान की चुनावी राजनीति का भी हिस्सा है। हिज़्बुल्लाह ने 1992 लेबनान की राजनीति में कदम रखा। 2022 के चुनाव के बाद लेबनान की 128 सीटों वाली संसद में हिज़्बुल्लाह के 13 सांसद हैं और उसके सहयोगी दलों की भी अपनी संख्या है। महत्वपूर्ण ये है कि हिज़्बुल्लाह लेबनान की सरकार नहीं है, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था का एक प्रभावी हिस्सा है।

हिज़्बुल्लाह एक सामाजिक संगठन

हिज़्बुल्लाह ईरान के एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो लेबनान के अंदर राजनीतिक और सामाजिक संगठन के तौर पर भी मज़बूत पहचान रखता है। हिज़्बुल्लाह ने शिक्षा के क्षेत्र में अल मेहदी नेटवर्क खड़ा किया, जिसके स्कूल लेबनान के कई शहरों में काम कर रहे हैं, तो अल-मुस्तफा स्कूल भी बच्चों को पढ़ाने के काम में लगे हैं। इस्लामिक हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन के बैनर तले अस्पताल, मेडिकल सेंटर, क्लीनिक, एम्बुलेंस सेवाएं और फॉर्मेसी जैसी सुविधाएं आम लोगों के लिए मुहैया करवाई जाती हैं। इसके अलावा और भी बहुत कुछ है, जिससे लेबननी लोगों को फायदा मिलता है।

क्या लेबनानी सरकार हिज़्बुल्लाह को कंट्रोल नहीं कर सकती?

लेबनान की चुनी हुई सरकार सैद्धांतिक रूप से हिज़्बुल्ला को कंट्रोल कर सकती है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर ये काफी मुश्किल काम नज़र आता है। इसकी कई वजहें हैं। हिज़्बुल्लाह की अपनी सैन्य क्षमता है, वो एक राजनीतिक ताकत है। लेबनान की एक बड़ी आबादी के बीच अच्छी पकड़ है। ईरान जैसी क्षेत्रीय शक्ति का साथ भी हासिल है, इसलिए लेबनान में पिछले कई दशकों से इस बात पर बहस हो रही है कि हथियार सिर्फ राज्य के पास होना चाहिए या हिज़्बुल्लाह जैसे संगठन भी हथियार रख सकते हैं। लेबनान की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था दुनिया के सबसे जटिल मामलों के तौर पर देखी जाती है।

इज़रायल पर लेबनान का सरकारी रुख़

लेबनान और इज़रायल के बीच कोई औपचारिक शांति संधि नहीं है और दोनों देश लंबे वक्त से दुश्मनी जैसे हालात से जूझ रहे हैं, लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि हिज़्बुल्लाह की हर एक कार्रवाई में लेबनान की सरकार साथ खड़ी होती है। कई बार हिज़्बुल्लाह और इज़रायल के बीच संघर्ष होता है। हिज़्बुल्लाह कहता है कि वो लेबनान की रक्षा के लिए प्रतिरोध कर रहा है और इसमें लेबनान के कई राजनीतिक दलों का उसे साथ भी मिलता है, तो कुछ राजनीतिक दल हिज़्बुल्लाह के फैसलों को देश को खतरे में डालने वाला मानते हैं।

लेबनान की सरकार कैसे चलती है?

लेबनान में एक तरह की अनौपचारिक समझ के साथ सरकार चलती है, जिसके तहत धार्मिक समुदायों के आधार पर सरकार के पदों को रखा गया है। लेबनान में राष्ट्रपति का पद ईसाई समुदाय से आने वाले उम्मीदवार को मिलता है। प्रधानमंत्री कोई सुन्नी मुसलमान बनता है, तो देश की संसद के अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी किसी शिया मुसलमान को दी जाती है। संसद के अंदर भी ईसाई और मुसलमान सांसदों के बीच सीटों का संतुलन रखा जाता है। हिज़्बुल्लाह और इज़रायल के बीच 1982 से लेकर अब तक कई बार जंग हुई और ज़्यादातर जंगों का कोई निर्णायक नतीजा नहीं निकला, लेकिन भारी नुकासन के बावजूद हिज़्बुल्लाह टिका रहा और टिका है। एक्सपर्ट्स ने 2006 में हिज़्बुल्लाह को एक शक्तिशाली रेसिस्टेंस फोर्स के तौर पर देखा। नवंबर 2024 में हसन नसरूल्लाह की मौत के बावजूद हिज़्बुल्लाह ने लड़ाई जारी रखी, तो मौजूदा वक्त में भी हिज़्बुल्लाह भारी नुकसान के बावजूद मैदान में डटा है, जिसे वो इज़रायल जैसी शक्ति के सामने अपनी जीत के तौर पर पेश करता है।

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